सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं
दिल रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है ?

कोठियों से मुल्क़ के मेआर को मत आँकिए
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है,

जिस शहर में मुंतज़िम अंधे हों जल्वागाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है,

ये नई पीढ़ी पे निर्भर है वही जजमेंट दे
फ़ल्सफ़ा गाँधी का मौज़ूँ है कि नक्सलवाद है,

यह ग़ज़ल मरहूम मंटो की नज़र है दोस्तो
जिसके अफ़साने में ठंडे गोश्त की रूदाद है..!!

~अदम गोंडवी

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे

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