राहतों के धोके में इज़्तिराब ढूँढे हैं

राहतों के धोके में इज़्तिराब ढूँढे हैं
हम ने अपनी ख़ातिर ही ख़ुद अज़ाब ढूँढे हैं,

ये तो उस की आदत है रोज़ गुल मसलता है
आज भी मसलने को कुछ गुलाब ढूँढे हैं,

रात आँधी आने पर उड़ गए थे ख़ेमे सब
ग़ाफ़िलों ने मुश्किल से कुछ तनाब ढूँढे हैं,

तेरी हुक्मरानी भी ख़त्म होने वाली है
हम ने कुछ किताबों में इंक़लाब ढूँढे हैं,

मेरे कुछ सवालों के तुम ने एक मुद्दत में
मसअलों से हट कर ही क्यूँ जवाब ढूँढे हैं ?

काले कारनामे और काला मुँह छुपाने को
कुछ सफ़ेद पोशों ने कुछ नक़ाब ढूँढे हैं,

देखिए ज़मीर हम भी हैं अजब ही दीवाने
छोड़ कर हक़ीक़त को हम जवाब ढूँढे हैं..!!

~ज़मीर अतरौलवी

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