दोनों में थी हवस कि मोहब्बत तो थी नहीं

दोनों में थी हवस कि मोहब्बत तो थी नहीं
यानी वफ़ा की उनको ज़रूरत तो थी नहीं,

अच्छा तो चाहती थीं ज़माने से तुम मुझे
लब पर कभी तुम्हारे शिकायत तो थी नहीं,

हाँ ले गई वो तुम को परेशानी क्यों भला
दिल मेरा था किसी की अमानत तो थी नहीं,

सीखा है आप ही से कि मुँहतोड़ दो जवाब
घर में हमारे ऐसी रिवायत तो थी नहीं,

यूँही वो खेलते थे खिलौना था उन का बस
यानी कि उन को मेरी ज़रूरत तो थी नहीं,

तुम हो जहाँ पे उसके भी लाएक़ हो तुम कहो
यानी तुम्हारी अपनी वो मेहनत तो थी नहीं,

मजरूह था मैं अपनों की बातों से अब भी हूँ
हँसता हूँ अब भी रोने की आदत तो थी नहीं,

हम ही रहे शरीफ़ हिदायत की राह पर
उन लोगों में ज़रा सी शराफ़त तो थी नहीं,

वो वर्ज़िशों के शौक़ में सज्दे किया किए
दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ इबादत तो थी नहीं,

अब क्यों करो किसी से मुरव्वत जहान में
लोगों को भी तुम्हारे मुरव्वत तो थी नहीं,

बस नाम ये बड़े थे अदब की बिसात पर
अपने किए पे उन को नदामत तो थी नहीं,

सच बोलने की ख़ू मुझे विर्से में है मिली
मेरी किसी से कोई अदावत तो थी नहीं,

हँस कर के जी रहे थे बलाओं के दौर में
इरशाद अपने क़ल्ब को राहत तो थी नहीं..!!

~इरशाद अज़ीज़


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