भूले से किसी और का रस्ता नहीं छूते

भूले से किसी और का रस्ता नहीं छूते
अपनी तो हर एक शख़्स से रफ़्तार जुदा है,

उस रिंद ए बला नोश को सीने से लगा लो
मयख़ाने का ज़ाहिद से पता पूछ रहा है,

मंजधार से टकराए हैं हिम्मत नहीं हारे
टूटी हुई पतवार पे ये ज़ो’म रहा है,

घर अपना किसी और की नज़रों से न देखो
हर तरह से उजड़ा है मगर फिर भी सजा है,

मयकश किसी तफ़रीक़ के क़ाइल ही नहीं हैं
वाइज़ के लिए भी दर ए मयख़ाना खुला है,

ये दौर भी क्या दौर है इस दौर में यारो
सच बोलने वालों का ही अंजाम बुरा है..!!

~जमील मुरस्सापुरी


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