कौन कहता है कि पी कर दूर हो जाते हैं ग़म ?
और याद आती हैं बातें और तड़पाते हैं ग़म,
मुस्कुरा कर अपनी ख़ुद्दारी की रख लेता हूँ लाज
मुस्कुराहट के हसीं पर्दे में छुप जाते हैं ग़म,
एहतियात ओ ज़ब्त बन जाता है जिस दिल का मिज़ाज
ऐसे दिल का चुपके चुपके काम कर जाते हैं ग़म,
यूँ भी अख़्लाक़न उन्हें दिल में जगह देता हूँ मैं
मुझ को अपना ही समझते हैं तो मिल जाते हैं ग़म,
तिश्ना कामान ए मोहब्बत के फ़साने ही सुनाओ
इस तरह ऐ हमदमो आँखों से बह जाते हैं ग़म,
हूँ तो ग़म क़िस्मत मगर पाया है वो रंगीं मिज़ाज
मुझ से बा’ज़ औक़ात कतरा कर गुज़र जाते हैं ग़म,
शे’र कह लेता हूँ उन के फ़ैज़ से मैं भी रईस
ख़ैर से इतना करम मुझ पर भी फ़रमाते हैं ग़म..!!
~रईस रामपुरी
क्या क्या न सामने से ज़माने गुज़र गए
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