याद आता है रोज़ ओ शब कोई

याद आता है रोज़ ओ शब कोई
हम से रूठा है बे सबब कोई,

लब ए जू छाँव में दरख़्तों की
वो मुलाक़ात थी अजब कोई,

जब तुझे पहली बार देखा था
वो भी था मौसम ए तरब कोई,

कुछ ख़बर ले कि तेरी महफ़िल से
दूर बैठा है जाँ ब लब कोई,

न ग़म ए ज़िंदगी न दर्द ए फ़िराक़
दिल में यूँही सी है तलब कोई,

याद आती हैं दूर की बातें
प्यार से देखता है जब कोई,

चोट खाई है बार हा लेकिन
आज तो दर्द है अजब कोई,

जिन को मिटना था मिट चुके नासिर
उन को रुस्वा करे न अब कोई..!!

~नासिर काज़मी

कुछ तो एहसास ए ज़ियाँ था पहले

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