वफ़ादारी पे दे दी जान मगर ग़द्दारी नहीं आई

वफ़ादारी पे दे दी जान मगर ग़द्दारी नहीं आई
हमारे खून में अब तक ये बीमारी नहीं आई,

ख़ुदा का शुक्र सोहबत का असर होता नहीं हम पर
अदाकारों में रह कर भी अदाकारी नहीं आई,

अमीर ए शहर हो कर भी नहीं कोई तेरी इज्ज़त
तेरे हिस्से में कभी गैरत और ख़ुद्दारी नहीं आई,

हमारी दरस गाहो की निज़ामत ऐसी बिगड़ी है
क़िताबे पढ़ के भी बच्चो में होशियारी नहीं आई,

लगाई आग उसने शहर में इतनी सफ़ाई से
कि उसके घर पे उड़ के एक भी चिंगारी नहीं आई,

अभी से किस लिए बेटे को भेजें नौकरी करने
हमारे दस्त ओ पा में इतनी लाचारी नहीं आई,

मैं नादानी पे अपनी आज तक हैरान हूँ दाना
कि दुनियाँ को समझने की समझदारी नहीं आई..!!


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