रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई
चाहत तुम्हारी यूँ दम ए कुश्तन नहीं गई,
तुम चाहते नहीं थे हमें फिर ये क्यों हुआ
अब भी तुम्हारी आँखों की उलझन नहीं गई,
करवट बदल के काटी थी हर शब तेरे बग़ैर
आदत वो अब भी छोड़ के मदफ़न नहीं गई,
सारी ख़ुदाई वैसे लगी तो रही मगर
इस दिल से तेरी याद भी दुश्मन नहीं गई,
एक बुत के इश्क़ में तू करे है ख़ुदा ख़ुदा
ऐ शम्स तेरी ज़ात ए बरहमन नहीं गई..!!
~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स


























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