अकेले रहने की सजा कबूल कर गलती तुमने की है
मुझ पर यूँ ऐतबार न करने में भी तुमने ही भूल की है,
कभी ये भी एहसास हुआ ख्याल ओ ख्वाबों में तुझे
भूल जाएंगे तेरी जिद में ज़िन्दगी हमने फिजूल की है,
न जाने कौन सा लम्हा तेरे लिए करार ए सबब होगा
बस वही सबब समझने में हमने बार बार भूल की है,
हमें भरोसा था कि एक दिन वापस लौट के आ जाएगा
ज़िन्दगी की किताब में हमने तेरी तस्वीर कबूल की है,
कई दिनों तक अपनी आँखे खुली रखी तेरे इंतजार में
मेरा दिल कह रहा है हमने तुझे समझने में भूल की है..!!
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