इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे

इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे
मेरे पास आ कर वो दुश्मन को दुआ देने लगे,

मयकदे का मयकदा ख़ामोश था मेरे बग़ैर
मैं हुआ वारिद तो पैमाने सदा देने लगे,

ख़त्म करनी ही पड़ेंगी शाम ए ग़म की उलझनें
अब वो अपने गेसुओं का वास्ता देने लगे,

एतिराफ़ ए औज का जज़्बा नहीं अहबाब में
हर तरक़्क़ी पर तरक़्क़ी की दुआ देने लगे,

दोस्तों की कजअदाई मैं भी लज़्ज़त है शकील
दोस्त वो है दोस्त बन कर जो दग़ा देने लगे..!!

~शकील बदायूनी


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