खुल के मिलने का सलीक़ा उन्हें आता नहीं
और मेरे क़रीब तो कोई चोर दरवाज़ा नहीं,
वो समझते है उन्हें पा कर ही मैं रह जाऊँगा
उनको मेरी प्यास की शिद्दत का अंदाज़ा नहीं,
दुनियाँ को दिखाएँ, मुझको क्या दिखाना गुरुर
गर वो समन्दर है तो है, मैं तो मगर प्यासा नहीं,
कोई भी दस्तक दे, आहट करे कि आवाज़ दे
मेरे हाथो में मेरा घर तो है मगर दरवाज़ा नहीं,
अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्ज़े के हो
और जब ऐसा किया मैंने तो कभी शरमाया नहीं,
उनकी महफ़िल में उन्ही की रौशनी जिनके चिराग़
मैं भी कुछ होता, तो मेरा भी दीया होता नहीं,
उनसे क्या बिछड़ा, मेरी सारी हकीक़त खुल गई
अब कोई मौसम मिले, तो मुझसे शरमाता नहीं..!!
~वसीम बरेलवी
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