कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे
खोए होऊँ से मिल ये दलद्दर उतार दे,
बे सम्त की उड़ान है शोख़ी शबाब की
उस छत पे आज तू ये कबूतर उतार दे,
मैं इतना बद मआ’श नहीं या’नी खुल के बैठ
चुभने लगी है धूप स्वेटर उतार दे,
दिन रात यूँ न ख़ौफ़ का गट्ठर उठाए फिर
ये बोझ अपने सर से झटक कर उतार दे,
उस की ही आब ओ ताब से रौशन हो रेग ए दिल
ये तेग़ मेरे सीने के अंदर उतार दे,
चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें
दीवार से पुराना कैलेंडर उतार दे,
ये बात ज़र्फ़ की नहीं है मावरा ए ज़र्फ़
चाहे तो इस कुएँ में समुंदर उतार दे,
लोगों के साथ मेरी लड़ाई है आज-कल
बेहतर है मुझ को शहर से बाहर उतार दे
तू ख़ुद तो सात पर्दों में मस्तूर है ज़फ़र
मल्बूस तेरे आगे वो क्यूँकर उतार दे..??
~ज़फ़र इक़बाल
उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर
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1 thought on “कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे”