क्या मिला और हुआ कितना ख़सारा सोचा

क्या मिला और हुआ कितना ख़सारा सोचा
बाद मुद्दत के यही क़िस्सा दोबारा सोचा,

रात फिर देर तलक नींद न आई मुझको
रात फिर देर तलक तुझको ही यारा सोचा,

मैं तो मर जाऊँगा तुझसे जुदा हो कर
कैसे होगा मेरे बिन फिर तेरा गुज़ारा सोचा,

अब मेरी सोच भी हैरान है, कैसे मैंने
इतनी फ़ुर्सत से तुझे सारा का सारा सोचा,

ये भी मुमकिन है कि ज़न्नत में ही मिले शायद
जैसा घर मैंने कभी अपना तुम्हारा सोचा,

आज आ जा कि तुझे शेर में अपने लिख लूँ
तू भी तो देखे कि तुझे कितना प्यारा सोचा,

तू मेरी रूह का हिस्सा है तभी जान मेरी
जब भी सोचा कभी अपना तो हमारा सोचा,

रो दिया आज तो दरियाँ भी सितम पर अपने
मरने वालो ने ऐसी हसरत से किनारा सोचा,

हम तुझे सोच के फिर और किसे सोचेंगे
बस यही सोच कर फिर तुझको ही दोबारा सोचा..!!


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