सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन न थी तिरी अंजुमन से पहले

सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन न थी तिरी अंजुमन से पहले
सज़ा ख़ता ए नज़र से पहले इताब जुर्म ए सुख़न से पहले,

जो चल सको तो चलो कि राह ए वफ़ा बहुत मुख़्तसर हुई है
मक़ाम है अब कोई न मंज़िल फ़राज़ ए दार ओ रसन से पहले,

नहीं रही अब जुनूँ की ज़ंजीर पर वो पहली इजारादारी
गिरफ़्त करते हैं करने वाले ख़िरद पे दीवानापन से पहले,

करे कोई तेग़ का नज़ारा अब उन को ये भी नहीं गवारा
ब ज़िद है क़ातिल कि जान ए बिस्मिल फ़िगार हो जिस्म ओ तन से पहले,

ग़ुरूर ए सर्व ओ समन से कह दो कि फिर वही ताजदार होंगे
जो ख़ार ओ ख़स वाली ए चमन थे उरूज ए सर्व ओ समन से पहले,

इधर तक़ाज़े हैं मस्लहत के उधर तक़ाज़ा ए दर्द ए दिल है
ज़बाँ सँभालें कि दिल सँभालें असीर ज़िक्र ए वतन से पहले..!!

~फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


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