ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें

ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें
यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म ए ज़िंदगी निबाहें,

कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश ए दश्त ए रहबर
कहीं जगमगा उठी हैं मेरे नक़्श ए पा से राहें,

तेरे ख़ानुमाँ ख़राबों का चमन कोई न सहरा
ये जहाँ भी बैठ जाएँ वहीं इन की बारगाहें,

कभी जादा ए तलब से जो फिरा हूँ दिल शिकस्ता
तेरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें,

मेरे अहद में नहीं है ये निशान ए सरबुलंदी
ये रंगे हुए अमामे ये झुकी झुकी कुलाहें..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं

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