एक बिखरते आशियाँ की बात है
एक शिकस्ता साएबाँ की बात है,
मेरे माथे के निशाँ की बात है
उन के संग ए आस्ताँ की बात है,
दर्द ओ ग़म के क़ाफ़िले का ज़िक्र है
अश्क की मौज ए रवाँ की बात है,
रूह का रिश्ता है ये तेरा मेरा
ये भला कब जिस्म ओ जाँ की बात है,
लोग जो कहते हैं तुम को बेवफ़ा
तुम बताओ ये कहाँ की बात है,
ज़ख़्म भर कर फिर हरे कैसे हुए
बस कफ़ ए चारा गराँ की बात है,
सच वही है जो अभी मैं ने कहा
बाक़ी ज़ेब ए दास्ताँ की बात है..!!
~सबीहुद्दीन शोऐबी
दुई का तज़्किरा तौहीद में पाया नहीं जाता
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