धड़कनें बन के जो सीने में रहा करता था
क्या अजब शख़्स था जो मुझ में जिया करता था,
नाख़ुन ए वक़्त ने हर नक़्श खुरच डाला है
मेरा चेहरा मेंरी पहचान हुआ करता था,
काई होंठों पे हमा वक़्त जमी रहती थी
एक दरिया मेंरी आँखों में थमा करता था,
एक तलातुम था तह ए आब सुकूत ए दरिया
दिल ए ख़ामोश में एक शोर रहा करता था,
मुर्तइश होता था जब ख़ामा ए अंगुश्त कभी
क्या क्या क़िर्तास ए ख़ला पर मैं लिखा करता था,
ज़ेहन ओ दिल इस लिए सरगर्म ए अमल रहते थे
रहनुमाई मेंरी हर वक़्त ख़ुदा करता था,
आबला पाइयाँ करती थीं अगर दिल शिकनी
हौसला फिर रह ए उम्मीद को वा करता था,
हो गया नज़्र बिल आख़िर मेंरी हक़गोई की
एक सर जो कभी शानों पे सजा करता था,
क्या हुआ आज ऐ सालिम वो शुऊर ए बालिग़
जो क़लम ज़द तेरी तहरीर किया करता था…!!
~सलीम शुजाअ अंसारी
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