गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ
गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ ज़िंदगी है हाओ हू के दरमियाँ, ज़ख़्म और पोशाक भी रखे गए
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गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ ज़िंदगी है हाओ हू के दरमियाँ, ज़ख़्म और पोशाक भी रखे गए
दिल को तेरे ध्यान में रखा शोर सूने मकान में रखा, हर तरफ़ आइने बिछाए और एक चेहरा
वो दूर ख़्वाबों के साहिलों में अज़ाब किस के हैं ख़्वाब किस के ये कौन जाने कि अब
जहाँ वहम ओ गुमाँ हो जाएगा क्या यहाँ सब कुछ धुआँ हो जाएगा क्या ? सितारे धूल और
उजाड़ आँखों में रत जगों का अज़ाब उतरा है नीम शब को जो दर्द जागा है शाम ढलते
वो किसी भी अक्स ए जमाल में नहीं आएगा वो जवाब है तो सवाल में नहीं आएगा, नहीं
गलियों की बस ख़ाक उड़ा के जाना है हम को भी आवाज़ लगा के जाना है, रस्ते में
जिन्हें हम कह नहीं पाए वो बातें याद आती हैं गुज़शता ना मुलाक़ातों की यादें याद आती हैं,
यादें पागल कर देती हैं बातें पागल कर देती हैं, चेहरा होश उड़ा देता है आँखें पागल कर
तेरा ख़याल बहुत देर तक नहीं रहता कोई मलाल बहुत देर तक नहीं रहता, उदास करती है अक्सर