ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया

khuddar mere shahar ka faaqon se mar gaya

ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया राशन जो आ रहा था वो अफ़सर के घर गया,

होंठों पे उसके जुम्बिश ए इंकार भी नहीं

honthon pe uske jumbish

होंठों पे उसके जुम्बिश ए इंकार भी नहीं आँखों में कोई शोख़ी ए इक़रार भी नहीं, बस्ती में

बिस्तर ए मर्ग पर ज़िंदगी की तलब

bistar e marg par

बिस्तर ए मर्ग पर ज़िंदगी की तलब जैसे ज़ुल्मत में हो रौशनी की तलब, कल तलक कमतरी जिन

हर आह ग़म ए दिल की ग़म्माज़ नहीं होती

har aah e gam dil

हर आह ग़म ए दिल की ग़म्माज़ नहीं होती और वाह मसर्रत का आग़ाज़ नहीं होती, जो रोक

हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही

ham se deewanon ko asari

हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही खोखली तहज़ीब की फ़र्ज़ानगी डसती रही, शोला ए नफ़रत तो

राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है

raahen dhuaan dhuaan

राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है ये मंज़िल ए मुराद तो बस दर्द दर्द है, अपने

ग़ैरत ए इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी

gairat e ishq salamat thi ana zinda thi

ग़ैरत ए इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी वो भी दिन थे कि रह ओ रस्म ए वफ़ा

क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ?

kyun na fir se daur e qadeem men jaya jaaye

क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ? माँग कर आग घर का चूल्हा जलाया

बहुत ख़राब रहा इस दौर मे

bahut kharab raha is daur men

बहुत ख़राब रहा इस दौर मे एक क़ौम का अच्छा होना, रास ना आया मनहूसों को क़ौम का

धड़कनें बन के जो सीने में रहा करता था

dhadkane ban ke jo sine men

धड़कनें बन के जो सीने में रहा करता था क्या अजब शख़्स था जो मुझ में जिया करता