बिस्तर ए मर्ग पर ज़िंदगी की तलब
जैसे ज़ुल्मत में हो रौशनी की तलब,
कल तलक कमतरी जिन की तक़दीर थी
आज उन को हुई बरतरी की तलब,
उम्र भर अपनी पूजा कराता रहा
अब हुई उस को भी बंदगी की तलब,
चीख़ते थे बहुत हम हर एक बात पर
हो गई अब मगर ख़ामुशी की तलब,
प्यास दुनिया की जिस ने बुझाई सदा
उस समुंदर को है तिश्नगी की तलब,
चार पैसे जो आए ज़रा हाथ में
उन को भी हो गई रहबरी की तलब,
देख कर ये नुमाइश की दुनिया असद
हम ने महसूस की सादगी की तलब..!!
~असद रज़ा
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