क्यूँ रवा रखते हो मुझसे सर्द मेहरी बे सबब
बीच में लाना पड़े थाना कचहरी बे सबब,
मैंने उस रुख से इसे जितना अलग रखा अबस
आँख थी गुस्ताख़ मेरी जा के ठहरी बे सबब,
ना किसी पायल की छन छन ना दस्तक कोई
कर रही है वार गहरे ये रात गहरी बे सबब,
पेड़ से रिश्ता है उसका और ज़मीं के साथ भी
दे रही फिर भी दुहाई है गिलहरी बे सबब,
अपने हक़ के वास्ते सब ही वहाँ मौज़ूद थे
आ गया ज़द में मगर नवाब शहरी बे सबब,
सच को सुनने का भला कब हौसला इनमे रहा
बन रही है क्यूँ हुकुमत ऐसी बहरी बे सबब..??
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