ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हमने
वक़्त ख़्वाबों में गँवाया है बहुत दिन हमने,
अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है
सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हमने,
तुम भी इस दिल को दुखा लो तो कोई बात नहीं
अपना दिल आप दुखाया है बहुत दिन हमने,
मुद्दतों तर्क ए तमन्ना पे लहू रोया है
इश्क़ का क़र्ज़ चुकाया है बहुत दिन हमने,
क्या पता हो भी सके इसकी तलाफ़ी कि नहीं
शायरी तुझ को गँवाया है बहुत दिन हमने..!!
~जाँ निसार अख़्तर
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