ये क़ुदरत भी अब तबाही की हुई शौक़ीन लगती है

ये क़ुदरत भी अब तबाही की हुई शौक़ीन लगती है
ऐ दौर ए ज़दीद साज़िश तेरी बहुत संगीन लगती है,

अदब, तहज़ीब, रिश्तो की नहीं है फ़िक्र अब कोई
आजकल दुनियाँ ख़ुद पसंदी में हुई तल्लीन लगती है,

हर एक शख्स अब यहाँ हैरान है ज़ायका ए ज़िन्दगी से
ये कभी खट्टी, कभी मीठी तो कभी नमकीन लगती है,

अँधेरा ए गम दिल के तहखानो में उनके क़ैद रहते है
जिनकी ज़िन्दगी देखने में अक्सर बहुत रंगीन लगती है,

ख़ुदा, मज़हब, ज़मीं, इन्सान तक तो तक़सीम कर डाले
फ़ज़ा इस मुल्क की अब तो बहुत ग़मगीन लगती है..!!


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