तार ए शबनम की तरह सूरत ए ख़स टूटती है
आस बँधने नहीं पाती है कि बस टूटती है,
आरज़ूओं का हुजूम और ये ढलती हुई उम्र
साँस उखड़ती है न ज़ंजीर ए हवस टूटती है,
गर्द इतनी कि सुझाई नहीं देता कुछ भी
शोर इतना है कि आवाज़ ए जरस टूटती है,
मुंहदिम होता चला जाता है दिल साल ब साल
ऐसा लगता है गिरह अब के बरस टूटती है,
बू ए गुल आए न आए मगर उश्शाक़ के बीच
इतनी वहशत है कि दीवार ए क़फ़स टूटती है,
ज़िक्र अस्मा ए इलाही का है फ़ैज़ान कि अब
दम उलझता है न तस्बीह ए नफ़स टूटती है..!!
~इफ़्तिख़ार आरिफ़
गिरफ़्ता दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने
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