वो माहिर थी फन ए अय्यारी में
अपने इश्क़ में मुझे बीमार कर गई,
अनाड़ी सी शख्सियत थी अपनी
वो मुहब्बत में भी कारोबार कर गई,
जिसे समझते रहे चारागर ए हयात
परिंदा समझ कर शिकार कर गई,
सबक़ ऐसा जो ना किताबो में था
इस क़दर मुझको होशियार कर गई,
हम निभाते रह गए अहद ए वफ़ा
वो लफ्ज़ ए वफ़ा को दागदार कर गई
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