पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे

पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे
सब रास्ते खुले थे मगर हम पे वा न थे,

ये और बात शौक़ से हम को सुना गया
फिर भी वही सुनाया सुना एक फ़साना थे,

एक आग साएबान था सर पर तना हुआ
पल पल ज़मीं सरकती थी और हम रवाना थे,

दरिया में रह के कोई न भीगे तो किस तरह
हम बे नियाज़ तेरी तरह ऐ ख़ुदा न थे,

हरगिज़ गिला नहीं है कि तू मेहरबाँ न था
कब हम भी अपने आप से बेहद ख़फ़ा न थे,

क्यूँ सब्र आश्ना न हुआ ना मुराद दिल
तेरे करम के हाथ तो यूँ बे अता न थे,

वो और हम से पूछे कि बिल्क़ीस कुछ तो कह
कमबख़्त हम कि होश ही अपने बजा न थे..!!

~बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन


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