मुझे इल्म है तुम रास्ते से पलट जाओगे
फिर तुम्हारे साथ सफ़र की इब्तिदा क्या करना ?
वैसे भी ये किसी और को मयस्सर होंगी
ये जुल्फें, ये लब, ये तेरी अदा का क्या करना ?
तुमने वफ़ा तो निभाई मगर रकीब के साथ
अब बताओ ये तुम्हारी उस वफ़ा का क्या करना ?
तुम न सही तुम्हारी निशानियाँ तो रख लूँ
ये तेरे ख़त, तस्वीरें जला कर क्या करना ?
मेरे बगैर अगर कोई तेरा आसरा नहीं माहिर
इधर आ मेरे पास तुझे फिर जुदा क्या करना..??
~माहिर
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