मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है
उश्शाक़ नहीं हम लोग पर रंग तो काही है,
हर ग़ुंचा ए लब दरबाँ हर शाख़ सिपाही है
सब्ज़े पे खिंचा नक़्शा और सुर्ख़ सियाही है,
एक साँवली पतझड़ के पुश्ते पे तबाही है
उधड़ी हुई क़ब्रों पर कत्बों की मनाही है,
ऐ काँच की सी पिंडली ये शहर ए सबा ही है..!!
~आमिर सुहैल


























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