जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका

जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका
शहर करिश्मा साज़ तमाशा न कर सका,

दुनिया ने घोल दी मेरे लहजे में तल्खियाँ
मैं गुफ्तगू का शौक़ भी पूरा न कर सका,

एक सब्ज़ रौशनी थी फ़ज़ाओं में खो गई
जाने मैं कहाँ खो गया पीछा न कर सका,

इस शहर ए दिल फ़रेब ने चाहा बहुत मगर
दे कर तवील हिज्र भी तन्हा न कर सका,

जादू ए इश्क के इस खेल में मुझे मारा गया
फिर यूँ हुआ कि कोई भी जिंदा न कर सका..!!


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