मैं हज़ार बार चाहूँ कि वो मुस्कुरा के देखे

मैं हज़ार बार चाहूँ कि वो मुस्कुरा के देखे
उसे क्या गरज़ पड़ी है जो नज़र उठा के देखे ?

मेरे दिल का हौसला था कि ज़रा सी खाक़ उड़ा ली
मेरे बाद उस गली में कोई और जा के देखे,

कहीं आसमान टूटा तो क़दम कहाँ रुकेंगे ?
जिसे ख़्वाब देखना हो वो ज़मीं पे आ के देखे,

उसे क्या ख़बर कि क्या है ये शिकस्त ए अहद ओ पैमां
जो फ़रेब दे रहा है वो फ़रेब खा के देखे,

है अज़ीब कशमकश में मेरी शमअ ए आरज़ू भी
मैं जला जला के देखूँ वो बुझा बुझा के देखे,

उसे देखने को कैसर मैं नज़र कहाँ से लाऊँ ?
कि वो आईना भी देखे तो छुपा छुपा के देखे..!!

~अज्ञात

सब को मा’लूम है ये बात कहाँ

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1 thought on “मैं हज़ार बार चाहूँ कि वो मुस्कुरा के देखे”

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