जलता रहा मैं रात की तन्हाइयों के साथ

जलता रहा मैं रात की तन्हाइयों के साथ
और तुम रहे हो सुब्ह की रानाइयों के साथ,

ऐ ज़िंदगी बता दे ज़रा इतना तू मुझे
कब तक रहेगी भागती परछाइयों के साथ ?

गुल रुत ने चूमा जैसे ही कल रात का बदन
खिलने लगी कली कली अंगड़ाइयों के साथ,

मुझ से मिले तो दिल के तो पर्दे हटा के मिल
तू है क़ुबूल फिर तेरी सच्चाइयों के साथ,

रुख़्सत हुई तो लब पे दुआएँ थी बेशुमार
आँखें बरस पड़ीं मेंरी शहनाइयों के साथ,

शिकवे गिले तो दूर से होते रहे मगर
एक बार मिल के बात न की भाइयों के साथ,

दुनिया से चल बसे हैं जो इरशाद देखना
आएँगे याद अपनी वो अच्छाइयों के साथ..!!

~इरशाद अज़ीज़


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