ग़म ए दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की

ग़म ए दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की
फ़लक का देखना तक़रीब तेरे याद आने की,

खुलेगा किस तरह मज़मूँ मेरे मक्तूब का या रब
क़सम खाई है उस काफ़िर ने काग़ज़ के जलाने की,

लिपटना पर्नियाँ में शोला ए आतिश का पिन्हाँ है
वले मुश्किल है हिकमत दिल में सोज़ ए ग़म छुपाने की,

उन्हें मंज़ूर अपने ज़ख़्मियों का देख आना था
उठे थे सैर ए गुल को देखना शोख़ी बहाने की,

हमारी सादगी थी इल्तिफ़ात ए नाज़ पर मरना
तेरा आना न था ज़ालिम मगर तम्हीद जाने की,

लकद कूब ए हवादिस का तहम्मुल कर नहीं सकती
मेंरी ताक़त कि ज़ामिन थी बुतों की नाज़ उठाने की,

कहूँ क्या ख़ूबी ए औज़ा ए अब्ना ए ज़माँ ग़ालि
बदी की उसने जिस से हम ने की थी बारहा नेकी..!!

~मिर्ज़ा ग़ालिब


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