देखा जो हुस्न ए यार तबीअत मचल गई

देखा जो हुस्न ए यार तबीअत मचल गई
आँखों का था क़ुसूर छुरी दिल पे चल गई,

हम तुम मिले न थे तो जुदाई का था मलाल
अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गई,

साक़ी तेरी शराब जो शीशे में थी पड़ी
साग़र में आ के और भी साँचे में ढल गई,

दुश्मन से फिर गई निगह ए यार शुक्र है
एक फाँस थी कि दिल से हमारे निकल गई,

पीने से कर चुका था मैं तौबा मगर जलील
बादल का रंग देख के नीयत बदल गई..!!

~जलील मानिकपूरी

शाम से आँख में नमी सी है

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