चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं

चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं
आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं,

ख़्वाब देखना हो सफ़र करना या रोना हो
मुझ में ख़ूबी है बेज़ार नहीं होता मैं,

अब भला अपने लिए बनना सँवरना कैसा
ख़ुद से मिलना हो तो तैयार नहीं होता मैं,

कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए
बस इसी खौफ़ से बीमार नहीं होता मैं,

मंज़िल ए इश्क़ पे निकला तो कहा रस्ते ने
हर किसी के लिए हमवार नहीं होता मैं,

तेरी तस्वीर से तस्कीन नहीं होती मुझे
तेरी आवाज़ से सरशार नहीं होता मैं,

लोग कहते है मैं कि मैं बारिश की तरह हूँ
अक्सर अवक़ात लगातार नहीं होता मैं..!!


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