मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है
मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है मोहब्बत मिस्र का बाज़ार भी है, मोहब्बत मुस्तक़िल आज़ार भी है ये
Shayari
मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है मोहब्बत मिस्र का बाज़ार भी है, मोहब्बत मुस्तक़िल आज़ार भी है ये
एक बिखरते आशियाँ की बात है एक शिकस्ता साएबाँ की बात है, मेरे माथे के निशाँ की बात
दुई का तज़्किरा तौहीद में पाया नहीं जाता जहाँ मेरी रसाई है मेरा साया नहीं जाता, मेरे टूटे
किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता, मोहब्बत
ख़ुदा जब तक न चाहे आदमी से कुछ नहीं होता मुझे मालूम है मेरी ख़ुशी से कुछ नहीं
ये तुझ से आश्ना दुनिया से बेगाने कहाँ जाते तेरे कूचे से उठते भी तो दीवाने कहाँ जाते,
जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद छोड़ गया है मुझ को कैसे
जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है वो मेरा है मगर मेरा नहीं है, जिसे खोने का मुझ
मैं जो कहता हूँ तू कजरवी छोड़ दे वो ये कहती है तू दोस्ती छोड़ दे, मैं ये
मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर मुझ से बिछड़ा हुआ कोई अपना