जज़्बा ए शौक़ को इस तौर उभारा जाए
जज़्बा ए शौक़ को इस तौर उभारा जाए हम जिधर जाएँ उधर उन का नज़ारा जाए, आपसी रिश्तों
Occassional Poetry
जज़्बा ए शौक़ को इस तौर उभारा जाए हम जिधर जाएँ उधर उन का नज़ारा जाए, आपसी रिश्तों
मैं ने कब अपनी वफ़ाओं का सिला माँगा था एक तबस्सुम ही तेरा बहर ए ख़ुदा माँगा था,
ज़बाँ का पास है तो क़ौल सब निभाने हैं अगर मुकरने पे आऊँ तो सौ बहाने हैं, तीर
रंग हवा से छूट रहा है मौसम ए कैफ़ ओ मस्ती है फिर भी यहाँ से हद्द ए
जितने वहशी हैं चले जाते हैं सहरा की तरफ़ कोई जाता ही नहीं ख़ेमा ए लैला की तरफ़,
ऐब ये है कि अपने बारे में कम सोचते हो मैं नहीं जो सोचते हो तो बस हम
ये मोहब्बत अगर ज़रूरत है ये ज़रूरत भी तो मोहब्बत है, मेरा भी दिल नहीं था रुकने का
उस ने यूँ रास्ता दिया मुझ को रास्ते से हटा दिया मुझ को, दूर करने के वास्ते ख़ुद
उम्र भर सीने में एक दर्द दबाए रखा एक बेनाम से रिश्ते को निभाए रखा, था मुझे वहम
लोग क्या से क्या न जाने हो गए आज कल अपने ही बेगाने हो गए, बेसबब रहगुज़र में