फिर हरीफ़ ए बहार हो बैठे
फिर हरीफ़ ए बहार हो बैठे जाने किस किस को आज रो बैठे, थी मगर इतनी राएगाँ भी
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फिर हरीफ़ ए बहार हो बैठे जाने किस किस को आज रो बैठे, थी मगर इतनी राएगाँ भी
हर सम्त परेशाँ तिरी आमद के क़रीने धोके दिए क्या क्या हमें बाद ए सहरी ने, हर मंजिल
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है,
सोच बदल जाती है,हालात बदल जाते हैं वक्त के साथ,लोगो के ख्यालात बदल जाते हैं, इस तरह चेहरे
उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह ज़िन्दा हैं लोग वक़्त की रफ़्तार की तरह, क्या रहना ऐसे
मैं अभी देख के आया हूँ हरे जंगल को सब्ज़ पेड़ों में भी वीरानी बहुत होती है, उन
वफ़ा की आरज़ू करना, सफ़र की जुस्तजू करना जो तुम मायूस हो जाओ, तो रब से गुफ़्तगू करना,
हर एक बात पे मुस्कुराता है झूठा कोई गम तो है जो छुपाता है झूठा, सब ख़ुश है,
कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ दर्द अगर उठे तो क्या शोर मचाने लग जाएँ,
जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते है कई पूछना था कि तेरा ध्यान भी रखता है कोई