उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह
उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह ज़िन्दा हैं लोग वक़्त की रफ़्तार की तरह, क्या रहना ऐसे
Life Poetry
उजड़े हुए हड़प्पा के आसार की तरह ज़िन्दा हैं लोग वक़्त की रफ़्तार की तरह, क्या रहना ऐसे
रात सुनती रही मैं सुनाता रहा दर्द की दास्ताँ मैं बताता रहा, लोग लोगो से चाहत निभाते रहें
चल निकलती हैं ग़म ए यार से बातें क्या क्या हम ने भी कीं दर ओ दीवार से
जैसा नज़र का शौक़ था वैसा न कर सका शहर करिश्मा साज़ तमाशा न कर सका, दुनिया ने
हाल में अपने मगन हो फ़िक्र ए आइंदा न हो ये उसी इंसान से मुमकिन है जो ज़िंदा
कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़ ए यार के यूँही बीत जाएँगे ये भी दिन जो
ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ हूँ जवार ए यार मैं या कूचा
बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता हमारे गाँव में बरसात क्यूँ नहीं करता ? महाज़ ए इश्क़
पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा, अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार
देखो अभी लहू की एक धार चल रही है बाज़ू कटे हैं फिर भी तलवार चल रही है,