कभी लफ्ज़ भूल जाऊँ, कभी बात भूल जाऊँ…

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कभी लफ्ज़ भूल जाऊँ कभी बात भूल जाऊँ तुझे इस क़दर चाहूँ कि अपनी ज़ात भूल जाऊँ उठ

जो तेरे प्यार के दरियाँ कशीद हो जाएँ

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जो तेरे प्यार के दरियाँ कशीद हो जाएँ मेरी हयात के मंज़र ज़दीद हो जाएँ, तुम्हारी चश्म ए

हम जो बे हाल ए ज़ार बैठे है…

हम जो बे हाल

हम जो बे हाल ए ज़ार बैठे है दिल की दिल में हार बैठे है, तेरी महफ़िल से

सितारों को जो छू कर देखते है

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सितारों को जो छू कर देखते है सिकंदर है मुक़द्दर देखते है, समन्दर में हमें दिखते है क़तरे

सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है

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सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है ये तकल्लुफ़ है कि जज़्बात की पामाली है,

खिड़कियाँ खोल रहा था कि हवा आएगी…

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खिड़कियाँ खोल रहा था कि हवा आएगी क्या ख़बर थी कि चिरागों को निगल जाएगी, मुझेको इस वास्ते

कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ…

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कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ हम भी न डूब जाएँ कहीं ना ख़ुदा के

ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है

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ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है ये हरम नहीं है ऐ शैख़

न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम

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न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या

किसी से भी नहीं हम सब्र की तलक़ीन लेते है…

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किसी से भी नहीं हम सब्र की तलक़ीन लेते है हमें मिलती नहीं जो चीज उसको छीन लेते