मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए
मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए तेरा हाथ हाथ में आ गया
Life Poetry
मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए तेरा हाथ हाथ में आ गया
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे गया फिर आज का दिन भी उदास कर
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म ए ज़िंदगी निबाहें,
शाम ए ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम आ भी जा आ भी जा आज मेरे सनम,
मसर्रतों को ये अहल ए हवस न खो देते जो हर ख़ुशी में तेरे ग़म को भी समो
हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़्यादा, चाक किए हैं हम ने अज़ीज़ो
जला के मिशअल ए जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले, दयार
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तेरे सामने मेरा हाल है, तेरी एक निगाह की बात है मेरी ज़िंदगी
ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो अपना पराया मेहरबाँ ना मेहरबाँ कोई न
आह ए जाँ सोज़ की महरूमी ए तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न