कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे
कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे खोए होऊँ से मिल ये दलद्दर उतार दे, बे सम्त
Gazals
कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे खोए होऊँ से मिल ये दलद्दर उतार दे, बे सम्त
उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर परवरिश पाई है अपने ख़ून ही की धार पर,
ख़्वाब में मंज़र रह जाता है तकिए पर सर रह जाता है, आ पड़ती है झील आँखों में
तार ए शबनम की तरह सूरत ए ख़स टूटती है आस बँधने नहीं पाती है कि बस टूटती
गिरफ़्ता दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने ख़ुदा करे कोई तेरे सिवा न पहचाने, मिटी मिटी सी उमीदें
मैं उससे जुदा वो मुझसे जुदा ये दोनों बातें एक सी हैं, आकाश में चाँद भी तारे भी
यकुम जनवरी है नया साल है दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है ? बचाए ख़ुदा शर की ज़द
जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी मैं तो आवाज़ हूँ आवाज़ की हिजरत कैसी ? सुनने वालों
रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में हम ने ख़ुश हो के भँवर बाँध लिए पाँव में,
हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर पर रोटी की कतार में आज भी