बड़ी क़दीम रिवायत है ये सताने की
करो कुछ और ही तदबीर आज़माने की,
कभी तो फूट कर रो लो हमारे शाने पर
हमेशा सोचते हो क्यों हमें ही रुलाने की,
चलो चले कही ऐसी जगह मेरे हमदम
जहाँ न शर्त हो रस्म ए कुहन निभाने की,
हजार आरज़ू पूरी करो तुम ज़माने की
कमी रहेगी मगर फिर भी और पाने की,
गम ओ अलम का भरम तोड़ना ज़रूरी है
हर आदमी को ज़रूरत है मुस्कुराने की,
उठाये रखते है जो पत्थर अपने हाथों में
मशाल आप ही बन जाते है ज़माने की,
न जाने चाँद मेरे घर में किस तरह उतरा
आख़िर ख़बर हुई उसे कैसे मेरे ठिकाने की ?
वफ़ा की राह में जब मुझको छोड़ जाना था
तो चाह क्या थी तुम्हे मुझसे दिल लगाने की ?
सुनाऊँ मैं क्या भला रुदाद ए ज़िन्दगी अपनी
कि हर बात ही दर्द भरी है मेरे फ़साने की..!!
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