अलबेली कामनी कि नशीली घड़ी है शाम
सर मस्तियों की सेज पे नंगी पड़ी है शाम,
बेकल किए है रैन के रसिया का इंतिज़ार
ग़मगीं है हुस्न ए शोख़ कि हैराँ खड़ी है शाम,
चमका दिया है इस के शरारों ने फ़िक्र को
एहसास ए इशक़ ओ हुस्न की एक फुलझड़ी है शाम,
ताबाँ है तेरा चेहरा कि है जल्वा ए सहर
रख़्शाँ है तेरी माँग कि तारों जड़ी है शाम,
रूठे हुए दिलों को भी इस ने मना लिया
मनमोहनी है कामनी चंचल बड़ी है शाम,
जाने कब आए आज सा हंगाम ए दिल नवाज़
यारो उठाओ जाम घड़ी दो घड़ी है शाम..!!
~कृष्ण मोहन

























