नसीम ए सुबह गुलशन में गुलो से खेलती होगी
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी,
तुम्हे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुज़रिम हूँ
नज़र आख़िर नज़र है बे इरादा उठ गई होगी,
मज़ा आ जाएगा महशर में कुछ सुनने सुनाने का
ज़ुबां होगी हमारी और कहानी आप की होगी,
सर ए महफ़िल बता दूँगा सर ए महशर दिखा दूँगा
हमारे साथ तुम होगे ये दुनियाँ देखती होगी,
यही आलम रहा पर्दानशीनो का तो ज़ाहिर है
ख़ुदाई आप से होगी न बंदगी हम से होगी..!!
~सीमाब अकबराबादी
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