ख़ुद अपनी ज़िल्लत ओ ख़्वारी न करना
किसी कमज़र्फ़ से यारी न करना,
अगर तुम शाद रहना चाहते हो
किसी की भी दिल आज़ारी न करना,
अगर तौफ़ीक़ हो सच बोलने की
तो अपनी भी तरफ़दारी न करना,
तुम्हें हम जानते पहचानते हैं
कभी हम से अदाकारी न करना
किसी के साथ कर लेना इबादत
हर एक के साथ मयख़्वारी न करना,
न गिर जाना रईस अपनी नज़र से
कभी तौहीन ए ख़ुद्दारी न करना..!!
~रईस रामपुरी
दिल में मेरे अरमान बहुत हैं
Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


























1 thought on “ख़ुद अपनी ज़िल्लत ओ ख़्वारी न करना”