कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है
पतझड़ में तो पात को आख़िर झड़ना पड़ता है,

कब तक औरो के साँचे में ढलते जाएँगे ?
किसी जगह तो हमको आख़िर उड़ना पड़ता है,

सिर्फ़ अँधेरे ही से दीये की जंग नहीं होती
तेज़ हवाओं से भी तो उसको लड़ना पड़ता है,

सही सलामत आगे बढ़ते रहने की खातिर
कभी कभी तो ख़ुद भी पीछे हटना पड़ता है,

शेर कहे तो अक्ल ओ जुनूँ की सरहद पर रुक के
अल्फाज़ में जज्बो के नगों को जड़ना पड़ता है,

ज़िन्दगी जीना इतना भी आसान नहीं आज़ाद
साँसों में रेज़ा रेज़ा बँटना पड़ता है..!!

~आज़ाद गुलाटी


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