यूँ उम्र भर रहे बेताब देखने के लिये
किसी कँवल का हंसीं ख़ाब देखने के लिये,
कहाँ थे देखो सनम हम कहाँ चले आये
वो गुलबदन के वो महताब देखने के लिये,
न जाने कब से हक़ीक़त की थी तलब हमको
न जाने कब से थे बेताब देखने के लिये,
छुआ तो जाना हर इक ख़्वाब था धुआँ यारो
बचा न कुछ भी यहाँ नायाब देखने के लिये,
क़रीब जा के हर एक चीज खोयी है हमने
लुटे हैं ज़िंदगी शादाब देखने के लिये,
कटी है ज़िंदगी अपनी भी यूँ उसूलों पर
फ़ज़ा में रह गया तल्ख़ाब देखने के लिये,
हाँ एक बार किया था भरम निग़ाहों पर
गये थे दश्त में तालाब देखने के लिये,
भटक रहे हैं अभी तक उन्हीं नज़ारों में
न मिल सका हमें गुल ख़्वाब देखने के लिये,
उजाड़ कर मेरे ख़्वाबों की छोटी सी दुनिया
मुझे वो दे गया इक ख़्वाब देखने के लिये,
यूँ दे के ज़ख़्म गया कोई ज़िंदगी भर को
किसी की आँख को ख़ूँ-नाब देखने के लिये,
न जाने ख़ाक हुईं हैं यहाँ कितनी ज़िंदगियाँ
सुकून ओ चैन का पायाब देखने के लिये,
तमाम ज़िंदगी हमने गुजार दी ‘आज़ी’
यहाँ तो ख़ुद को ज़फ़रयाब देखने के लिये..!!
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