ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है

ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है
मौसम की हवा अब के जुनूँ ख़ेज़ बहुत है,

रास आए तो है छाँव बहुत बर्ग ओ शजर की
हाथ आए तो हर शाख़ समर रेज़ बहुत है,

लोगो मेरी गुलकारी ए वहशत का सिला क्या
दीवाने को एक हर्फ़ ए दिल आवेज़ बहुत है,

मुनइम की तरह पीर ए हरम पीते हैं वो जाम
रिंदों को भी जिस जाम से परहेज़ बहुत है,

मस्लूब हुआ कोई सर ए राह ए तमन्ना
आवाज़ ए जरस पिछले पहर तेज़ बहुत है,

मजरूह सुने कौन तेरी तल्ख़ नवाई
गुफ़्तार ए अज़ीज़ाँ शकर आमेज़ बहुत है..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए

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