किस क़दर साहब ए क़िरदार समझते हैं मुझे

किस क़दर साहब ए क़िरदार समझते हैं मुझे
मुझको था ज़ो’म मेरे यार समझते हैं मुझे,

अब तो कुछ और भी गहरी हैं मेरी बुनियादें
अब तो घर वाले भी दीवार समझते हैं मुझे,

मैं तो बाज़ार में उतरा था कि रौनक है यहाँ
और ये लोग ख़रीदार समझते हैं मुझे,

ऐ मेरे इश्क़ ! तेरे वास्ते ख़ुशख़बरी है
अब तो बीमार भी बीमार समझते है मुझे,

मेरी कोशिश है कि हो जाऊँ खड़ा हक़ के साथ
और वो अपना तरफ़दार समझते हैं मुझे,

कुछ तो मेरी भी तबीयत में अना शामिल है
और कुछ लोग भी ख़ुद्दार समझते हैं मुझे,

खाक़ समझेंगे हकीक़त मेरे अफ़साने की
ये जो अफ़साने का क़िरदार समझते हैं मुझे,

इन्हीं लोगो ने कभी हौसला तोड़ा था मेरा
अब यही काफ़िला, सालार समझते हैं मुझे,

मैं यज़ीदियों से छुपा फिरता यहाँ पहुँचा हूँ
और ये लोग अज़ादार समझते हैं मुझे,

हाय अफ़सोस ! अज़ब आलम ए तन्हाई है
अब तो घर वाले भी फ़नकार समझते हैं मुझे,

कितना आसान हुआ करता था मैं पहले पहल
अब तो सब अपने भी दुश्वार समझते हैं मुझे..!!

~लियाक़त जाफ़री


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