हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो,
रहेगी वा’दों में कब तक असीर ख़ुशहाली
हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो,
न करते शोर शराबा तो और क्या करते
तुम्हारे शहर में कुछ और काम काज भी हो,
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं
हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो,
बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में
मरज़ पुराना है इस का नया इलाज भी हो,
अकेले ग़म से नई शाइरी नहीं होती
ज़बान ए मीर में ग़ालिब का इम्तिज़ाज भी हो..!!
~निदा फ़ाज़ली
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


























1 thought on “हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो”